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Friday, May 7, 2021

पद्मश्री नरेंद्र कोहली जी से साहित्य यात्रा के संपादक प्रो. कलानाथ मिश्र...


नमस्कार मित्रों 

आईए इसके पूर्व कि मैं आपको नरेन्द्र कोहली जी से सात वर्ष पहले कि एक यादगार बातचीत का अंश दिखाऊँ आपको एक संस्मरण सुना देता हूँ। 2014 की बात है, मैं दिल्ली गया हुआ था। स्वाभाविक रूप से मैंने आदरणीय कोहली जी को फोन किया। भाईसाहब मैं दिल्ली आया हूँ। उन्होंने प्रसन्नाता व्यक्त करते हुए कहा, जाओ भाई, भेंट होनी चाहिए। मैंने पूछा आपको कब सुविधा होगी? उन्होंने कहा 3 बजे के बाद ठीक रहेगा। मैं तबतक थोरा आराम भी कर लूँगा। १२ बज रहा था| मै १२.४५ तक घर से निकाल गया | जनता था की कोहली जी समय के पावन्द हैं| मैं मेट्रो से नजदीक का स्टेशन पहुंचा, मन ही मन  उनसे मिलने पर साहित्य यात्रा के लिए बातचीत करने की योजना बना ली थी। भाई आशीष कांधवे जी को पहले ही फोन कर दिया था। उन्होंने मेट्रो स्टेशन पर गाड़ी भेज दी थी। मैं सीधे आशीष जी के कार्यालय गया और वहाँ से फिर उन्हीं की गाड़ी से कोहली जी के यहाँ पहुँचा। कोहली जी की सहजता देखिये कि वे पहले से ही इन्तजार कर रहे थे। भीतर जाकर मैंने विनम्रता पूर्वक अभिवादन किया। मैं बता दूँ कि उनके सोफा का बगलवाला जो बाहु आश्रय है वह बहुच चौरा है। बहुआश्रय समझे ? (armrest) आप बातचीत के क्रम में सोफ़ा देख ही लेंगे। उन सभी बाहुआश्रय के ऊपर विभिन्न आकार का श्रीमद्भागवत गीता और महाभारत रखा था। मैं ने उनसे बातचीत के क्रम मे सवाल किया तो जाकर एक नवीन राज खुला। उन्होंने कहा कि मैं भविष्य की योजनाओं पर किसी से बात नहीं करता, पर पहली बार आपको बताता हूँ। मैं सोच रहा हूँ कि गीता पर उपन्यास लिखा जाय। मैंने कहा गीता में संवाद कहाँ है? उन्होंने कहा हाँ, यही तो समस्या है पर मैं सोच रहा हूँ। मैंने कहा इसी सोचने के क्रम मे सोफ़ा पर महाभारत और गीत आपने जमा कर रखा है| उन्होंने कहा मैं शाम को  घर में सभी को बिठाकर गीता, महाभारत पर चर्चा करता हूँ। इससे दो लाभ होता है। एक तो बच्चों में संस्कार आता  है। वे भारतीय संस्कृति से परिचित होते हैं और दूसरा यह कि मैं मन ही मन उपन्यास लिखने की योजना को लेकर मन में चलरहे विचारों को स्वरूप प्रदान करता रहता हूँ। 

दोसाल बाद 2016 मे यह उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। इसबीच उपन्यास को लेकर फोन पर कई बार आदरणीय कोहली जी से बातचीत हुई। साहित्य यात्रा मे प्रकाशन के पूर्व उपन्यास का अंश भी छपा। प्रकाशन के तुरत बाद 'शरणम' डाक से मेरेपास पहुंच गया। उनदिनों मेरी पत्नी म्भीर रूप से अस्वस्थ चल रही थीं और रूबन मे भर्ती थीं। मैं सारा दिन उनके पास बैठा रहता था। मन की क्या अवस्था थी कह नहीं सकता। आशा का दीपक आहिस्ता-आहिस्ता क्षीण हो रहा था, मन में निराशा के  बादल छा रहे  थे, अवसाद भर रहा था। ऐसे में मेरे हाथ शरणम लग गया। अस्पताल में बैठकर गीता पढ नहीं सकता था| अतः शरणम पढा करता था। गीता पढने के बाद जो एक विशेष भाव मन में जगता है कुछ उसी तरह का भाव कोहली जी रचित 'शरणम' पढकर मिला। मन को शांति मिली।

आज कोहली जी हमारे बीच नहीं हैं।...

हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार पद्मश्री नरेंद्र कोहली जी का जाना हिन्दी जगत में एक महाशून्य दे गया। दिनांक १७ अप्रैल २०२१ के दिन उन्होंने  अंतिम साँस ली।  मेरे लिए यह व्यक्तिगत क्षति है। मेरा पूरा परिवार शोक मे डूबा है। यह उनका स्नेह ही था कि पटना आने पर वे मेरे आवास पर अवश्य आते थे अथवा मुझे फोन कर बुलवा लेते थे। वे एक सिद्धहस्त साहित्यकार, उपन्यासकार थे। उनका बेबाकीपन, उनकी सहजता, उनका स्नेह से भरा व्यक्तित्व इस क्षण मेरे मन को अवसाद से भर रहा है। वे इस तरह एकाएक चले जाएँगे इसकी कल्पना भी नहीं थी। कालजयी कथाकार थे डॉ. नरेन्द्र कोहली। पौराणिक आख्यानों को उन्होंने आधुनिक संदर्भ में लिखकर विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया। कोहली जी आज के वैज्ञानिक युग में मानते थे कि नायक का नायकत्व आदर्शमय, प्रेरणादायी होने के साथ-साथ विश्वसनीय एवं अनुकरणीय भी होना चाहिए। इस कारण कोहली जी ने अपने उपन्यासों में राम, कृष्ण को नए मानवीय, विश्वसनीय, सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक एवं अत्याधुनिक रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय संस्कृति के अजस्र श्रोत को आधुनिक काल में नवीन संदर्भ में ढालकर पाठकों के लिए प्रस्तुत करना उनकी अमूल्य देन है।

राम कथा पर लिखे गए अद्वितीय उपन्यासों के लिए उन्हें आधुनिक तुलसीदास के रूप में भी स्मरण किया जाता है। वे हिंदी साहित्य के लिए अक्षय भण्डार छोर गए हैं। वे साहित्य यात्रा के परामर्शी भी थे। आधुनिक युग में इन्होंने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया। उनका हृदय राममय था।  रामजी उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। साहित्य यात्रा का एक विषेष अंक उनपर केन्द्रित था। यहाँ प्रस्तुत है उनका यह अविष्मरणीय बातचीत जो मैंने उनसे साहित्य यात्रा के लिए की थी। पूर्व से पूरी तैयारी तो थी नहीं फिर भी मेरे पास मोबाइल था सो  एकाएक मन मे आया की रिकार्ड कर लूँ | आशीष जी ने साथ दिया| किसी तरह बातचीत का कुछ अंश रिकार्ड हो गए| पूरी बातचीत होते होते बटरी खतम हो गया| किन्तु जो बातचीत है वह आज अमूल्य है| इस साक्षात्कार के रेकार्डिग में सहयोग के लिए मैं आधुनिक साहित्य के संपादक डा. आशीष कांधवे जी को धन्यवाद देता हूँ | आप देखें और सुनें| आनद आएगा|


Thursday, April 22, 2021

 हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार पद्मश्री नरेंद्र कोहली जी का जाना हिन्दी जगत में एक महाशून्य दे गया। दिनांक १७ अप्रैल २०२१ के दिन उहोन ने अंतिम साँस ली | मेरे लिए यह व्यक्तिगत क्षति है | मेरा पूरा परिवार शोक मे डूबा है | पटना आने पर वे मेरे आवास पर अवश्य आते थे | वे एक सिद्धहस्त साहित्यकार, उपन्यासकार थे। मेरा उनसे व्यक्तिगत संबंध रहा। उनका बेबाकीपन, उनकी सहजता , उनका स्नेह से भरा व्यक्तित्व इस क्षण मेरे मन को अवसाद से भर रहा है | वे इस तरह एकाएक चले जाएँगे इसकी कल्पना भी नहीं थी। कालजयी कथाकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने हिंदी साहित्य के लिए साहित्य का अक्षय भण्डार छोर गए हैं | वे साहित्य यात्रा के परामर्शी थे | आधुनिक युग में इन्होंने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया| उनका ह्रदय राममय था | रामजी उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें |

Raj Chandra Jha, Anita Jha and 101 others
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Monday, February 10, 2020

हिंदी कश्मीरी संगम और उत्तर प्रदेश हिंदी संसथान के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक ६-७ फ़रवरी को 'कश्मीरी, डोगरी और हिंदी साहित्य के अन्तर्सम्बन्ध की चुनौतियाँ ' विषय पर आयोजित संगोष्ठी बहुत ही सार्थक रहा | कुछ पत्रों की प्रस्तुति तो बहुत ही महत्वपूर्ण रहा | इस संगोष्ठी के माध्यम से हिंदी के साथ कश्मीरी डोगरी के अन्तर्सम्बन्ध को समझने और इसमें आ रहे विभिन्न चुनौतियों से रूबरू होने का अवसर मिला | आयोजकों के प्रति आभार की उन्हों ने मुझे श्री भट्ट मनीषी सम्मान से सम्मानित भी किया | शहजादा नन्द कॉलेज, अमृतसर की पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अतुला भास्कर की पुस्तक ' भारतीय छंद परंपरा में पंजाब रीत्याचार्य कवि' का लोकार्पण भी करने का अवसर मिला |



Sunday, December 27, 2015

रिपोर्ट

‘आवारा मसीहा की औपन्यासिकता’ का लोकार्पण


19 दिसम्बर का दिन था। सुबह से काफी ढंड पड़ रही थी। दस बजे के बाद धूप खिली तो शरीर को थोड़ी राहत मिली। वैसे तो यह दिन भी अन्य दिनों की भांति अपनी गति के साथ चल रही थी, किन्तु इन सबों के बीच पटना की साहित्यक भूमि पर साहित्य एवं संस्कृति का एक नया अध्ययन लिखा जा रहा था। अवसर था हिन्दी के सुप्रतिष्ठ कथाकार समालोचक डाॅ. कलानाथ मिश्र की पुस्तक ‘आवारा मसीहा की औपन्यासिकता’ के लोकार्पण का। ‘नई धारा’ द्वारा आयोजित इस लोकार्पण समारोह की विशेषता यह थी कि पुस्तक का लोकार्पण नईधारा की कवयित्री और डा. मिश्र की धर्मपत्नी श्रीमती राजकुमारी मिश्र कर रही थीं।  आयोजन के लिए डाॅ. कलानाथ मिश्र के आवासीय परिसर 'अभ्युदय' के  लाॅन को चुना गया । यह वही परिसर है जिसमें कई जानेमाने साहित्यकार पधारते रहे हैं । साहित्य अकादमी से सम्मानित सुप्रतिष्ठ साहित्यकार डा. राम दरश मिश्र,  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, चित्रामुद्गल, हिमांशु जोषी, केदार नाथ सिंह, भगवती शरण मिश्र, बालेन्दु शेखर तिवारी, गंगा प्रसाद विमल, राधेश्याम तिवारी, पंकज सिंह, अमरनाथ अमर  समेत हिन्दी के कई  मूर्धन्य साहित्यकार पधार कर इस परिसर को अपने स्नेह और साहित्यिक सुगंध से मादक बना दिया है। छोटी-छोटी दूब से भरी लाॅन के चारों ओर सलिके से रखे गमलें तथा उनमें लगी तरह-तरह के फूल-पौधे आयोजन को पूर्णतः साहित्यिक रंग से सरोबोर कर रही थी।
ढ़ाई बजते-बजते कई साहित्यकारो, बुद्धिजीवियों का आगमन हो चुका था। निर्धारित समय पर आयोजन आरंभ हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में ए.एन. काॅलेज के प्रधानाचार्य डाॅ. ललन सिंह तथा अध्यक्ष डाॅ. रामशोभित प्रसाद सिंह के आ जाने पर लोकार्पणकर्ता डाॅ. मिश्र की पत्नी श्रीमती राजकुमारी जी मंचासीन हुईं, श्रीमती मिश्र कुछ अस्वस्थ दिख रही थीं फिर भी उनके चेहरे पर स्मित व्याप्त था।  कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसके पश्चात उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्तियों ने डाॅ. मिश्र के पिता एवं साहित्यानुरागी पं. गणनाथ मिश्र जी के तैल चित्र पर पुष्प अर्पित किया। कितने जिन्दादिल थें पं. गणनाथ मिश्र। मेरा यह शौभाग्य रहा कि पण्डित जी के साथ मेरा पिछले चार-पाँच वर्षें से परिचय था। जब भी सर के घर पहंुचता गणनाथ बाबा बड़े प्रेम से मिलते। उनके चरणों को छूकर मन को एक अपूर्व शांति महसूस होती। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए स्नातकोत्तर हिन्दी ए.एन. काॅलेज के छात्र-छात्रा सीमा कुमारी, खुशबू कुमार, शिवनंदन प्रसाद, विकास कुमार, अमित मिश्र (मैं) ने पुष्प गुच्छ से मंचासीन विद्वानों तथा ‘नई धारा’ के संपादक डाॅ. शिवनारायण का स्वागत किया।
डाॅनबास्को स्कूल की हिन्दी शिक्षिका तथा शोध छात्रा करूणा पीटर ने श्रीमती राजकुमारी मिश्र की चर्चित कविता ‘कौन हो तुम प्रिय मेरे’ का पाठ किया। यह कविता इतनी मार्मिक है तथा कुरूणा जी ने जिस भाव प्रवणता के साथ इस का पाठ किया कि उपस्थित सभी स्रोता भावुक हो उठे।
मान्य अतिथियों का स्वागत एवं लेखकीय उद्गार व्यक्त करते हुए कलाानाथ मिश्र ने कहा कि आवारा मसीहा को पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह पुस्तक जीवनी होते हुए भी औपन्यासिक प्रभाव से संपृक्त है। वस्तुतः शरत् चंद का जीवन अपने आप में एक उपन्यास की तरह था। विष्णु प्रभाकर ने जब उनकी प्रमाणिक जीवनी लिखा तो उसमें औपन्यासिक प्रभाव का होना स्वाभाविक था। मैंने आवारा मसीहा के उन स्थलों को चिन्हित किया जहाँ विष्णु प्रभाकर ने अपनी कल्पनाशीलता से उनके पूरे जीवन को कलात्मक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया है। शरत् के जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं पात्रों और मनोभवों के चित्रण में विष्णु प्रभाकर की सृजनशीलता और कल्पनाशीलता सत्त सक्रिय रही है।
लोकार्पण के संदर्भ में अपनी बात कहते हुए कलाानाथ मिश्र ने कहा कि इस पुस्तक के लोकार्पण का अधिकार सर्वप्रथम किसी महिला को ही होना चाहिए था। महिलाओं के प्रति शरत् की जो संवेदना थी उस दृष्टि से भी शरत् पर लिखे किसी पुस्तक के लोकार्पण की अधिकारिणी सर्वप्रथम स्त्री ही हैं। दूसरी बात यह कि राजकुमारी जी बंग भाषा में पढ़ी लिखी है इनका मानस बंगाल की संस्कृति से संपृक्त है और एक अच्छी कवयित्री भी हैं अतः इन्होंने इस पुस्तक के लोकार्पण की स्वीकृति देकर अनुगृहीत ही किया है मुझे।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डाॅ. ललन सिंह ने कहा, कि ‘कलानाथ जी एक कुशल संपादक भी हैं। शोध पत्रिका ‘साहित्य-यात्रा’ के साथ-साथ काॅलेज पत्रिका ‘अनुग्रह ज्योति’ का भी संपादन वे करते रहे हैं। उनकी संपादकीय क्षमता उनके सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि का परिचायक है। विपरीत परिस्थिति में भी उन्होंने रचनाकर्म जारी रखा है यह सराहनीय है तथा सहित्य के प्रति उनके लगाव का परिचायक है।

प्रसिद्ध पत्रिका ‘नई धारा’ के संपादक डाॅ. शिवनारायण ने आयोजन का कुशल संचालन करते हुए कहा कि ‘एक ओर जहाँ कलानाथ मिश्र की कहानियों में वर्तमान जीवन के सामाजिक रिश्तों का यथार्थ दर्शित है वहीं दूसरी ओर उनका आलोचना कर्म, बौद्धिक विवेचन और बारीक विश्लेषण पर आधारित है। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों की जीवनी इतना रोचक होता है कि उसको लेकर कई बार यह विवाद होता रहा है कि यह जीवनी है अथवा उपन्यास। उन्होंने कहा कि जब आवारा मसीहा का प्रकाशन हुआ था उस समय यह विवाद जोरों पर था कि इसका शिल्प क्या है? हला कि लेखक ने इसे स्वयं जीवनी ही माना है। ऐसे में इस पुस्मक का सृजन निश्चय ही पाठकों को दोनों विधाओं की बारीकियों को समझने में सहायता करेगी। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक और पहले आती तो अच्छा होता।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार एवं जानेमाने पुस्तकालय विज्ञानी डा. रामशोभित प्रसाद सिंह ने कहा- ‘प्रस्तुत पुस्तक ‘आवारा मसीहा की औन्यासिकता’ में कलानाथ मिश्र ने शरत् की जीवनी और उपन्यास कला के आधार पर आलोचनात्मक दृष्टि से उसकी पड़ताल की है। डा. मिश्र एक सिद्धस्त कहानीकार हैं अतः विष्णु प्रभाकर द्वारा शरत्चंद्र के जीवन पर लिखित प्रसिद्ध पुस्तक ‘आवारा मसीहा’ -जिसे स्वयं विष्णु प्रभाकर जी ने एक प्रामाणिक जीवनी कहा है- की औपन्सासिकता का बारीक अघ्ययन करने में इन्हें सफलता मिली हैै।

कार्यक्रम के दौरान अनुग्रह नारायण महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक एवं जाने-माने साहित्यकार उपस्थित थे। हिन्दी विभाग के परिष्ठ प्राध्यापक डा. बद्रीनारायण सिंह, डाॅ. संजय सिंह, राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डाॅ. बिमल प्रसाद सिंह, समाजशास्त्र के अध्यक्ष डाॅ. अजय कुमार आदि ने डाॅ. मिश्र के सृजनकर्म एवं ‘आवारा मसीहा की औपन्यासिकता’ पुस्तक की विशेषताओं से उपस्थित बुद्धिजीवियों का परिचय कराया। इसी क्रम में डाॅ मिश्र के चाचा, अवकाश प्राप्त भा. प्र. से. के अधिकारी एवं संस्कृत के वि़द्वान श्री भवनाथ मिश्र ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि- कलानाथ जी पहले विज्ञान के छात्र थे। उनमें बचपन से ही साहित्यिक अभिरुचि थी। जो उन्हें पारिवारिक विरासत में मिली है। इनके पितामह शांतिनिकेतन में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ जी के साथ प्राध्यापक थे। अतः हिन्दी में जितना काम इन्होंने अभीतक किया है वह सराहनीय है किन्तु अभी इनकी क्षमता शेष है। मुझे उम्मीद है कि और महत्वपूर्ण रचना इनके द्वारा भविष्य में होगी।
कार्यक्रम में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रसिद्ध कवि निविड़ शिवपुत्र ने डा. कलानाथ मिश्र की रचनाकर्म की सराहना करते हुए कहा कि डा. मिश्र एक अच्छे आलोचक तो हैं ही लेकिन मुझे इनमें छुपे कहानीकार ने इतना प्रभावित कर दिया है कि मैं बस इनकी कहानियों का पाठक ही बना रहना चाहता हूँ।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डा. कलानाथ मिश्र के बड़े भाई एवं पी एण्ड एम माॅल के मुख्य महाप्रबंधक श्री विजयनाथ मिश्र ने कहा कि कलानाथ की साहित्यिक रूचि का ज्ञान हमें तब हुआ जब उन्होंने बचपन में ही मुझ पर केन्द्रित एक व्यंग्य लिखा था जिसका प्रसारण रेडियो पर उन दिनों हुआ था। उस व्यंग्य की पाण्डुलिपि कहीं खो जाने के कारण वह अब तक अप्रकाशित है किन्तु उसके बाद हमने उनकी साहित्यिक रूचि को जानकार उन्हें इसी दिशा में अग्रसर होने का मार्ग दिया।
एक ओर यह सब गतिविधयां चल रही थीं दूसरी ओर लोगों को ठंड के इस मौसम में गर्मागर्म काॅफी परोसी जा रही थी। लोग काॅफी के की चुस्की के साथ हीं साहित्यिक आयोजन का लुप्त उठा रहे थें। समय के साथ हीं डाॅ. कलानाथ मिश्र के स्वागत भाषण से शुरू हुआ।
यह साहित्यिक  भूमि इतने मात्र से हीं संतुष्ट नहीं दिख रही थी। वातावरण में सांध्य की छटा छाने लगी थी। सूर्यदेव पुस्तक को विभूषित कर धीरे-धीरे अवसान की ओर प्रस्थान कर रहे थे और इधर शहर के प्रसिद्ध कवि काव्य पाठ कर रहे थे। सुप्रतिष्ठ कवियित्री भावनाशेखर, ऋषिकेश पाठक, डाॅ. निरूपमा राय, इति माधवी, निविड़ शिवपुत्र आदि ने अपनी कविता के द्वारा आयोजन में प्राण फूंक दिए। मैंने भी अपने एक अजल ‘करके सितम मुझे पास बुलाता है कोई’ प्रस्तुत की जो लोगों के द्वारा काफी सराही गयी। ‘नई धारा’ के संपादक डाॅ. शिवनारायण ने अपनी एक कविता का पाठ कर जिसमें एक पुत्र ने अपने पिता से फरियाद करते हुए अपनी व्यथा-कथा कही गयी थी, से सभा को मुग्ध कर दिया। इस कार्यक्रम का समापन डाॅ. कलानाथ मिश्र द्वारा पाठ की गई उनकी कविता ‘साथी अर्ध पड़ाव आया’ से हुआ।
इस प्रकार यह साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन उपस्थिति लोगों के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ते हुए समाप्त हुई।

अमित मिश्र

Sunday, September 27, 2015

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एक यादगार क्षण आदरणीय रामदरश मिश्र एवं सरश्वती मिश्र साथ