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Friday, May 1, 2026

 लघुकथा

रक्षक

·      कलानाथ मिश्र

   आज सुजाता के ऑफिस पहुँचते ही सब ने उसे घेर लिया। सबके चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित जिज्ञासा का भाव था। सबने आपस में कानाफूसी सुरू कर दी।

आशा से रहा नहीं गया। उसने पूछ ही लिया- अरे सुजाता! तू तो छुपीरुस्तम निकली?

सुजाता ने जानकर भी अंजान बनते हुए कहा-क्यों क्या हुआ?

आशा चिढ़ गयी। मुँह बनाते हुए कहा- ‘अब ज्यादे बन मत। यह हाथ में चूड़ी..., यह माथे पर बिंदी..., तुमने बताया भी नहीं और शादी कर ली?

सुजाता का चेहरा मलिन पर गया। उसने भावुकता के साथ कहा-‘क्या बात करती हो? तुमसब जानते हुए भी अंजान बन रही हो? कई बार कह चुकी हूँ कि उनके बाद उनका स्थान किसी को नहीं दे सकती।’

वंदना ने नम्रता के साथ कहा- ‘वही तो सुजाता दी! आप तो जीजा जी के जाने के बाद कभी न बिंदी लगाईं माथे पर? न कभी आपकी कलाईयों पर चूड़ियां ही देखी हम सबने। फिर यह आज अपके माथे पर ये लाल बिंदी, ये हाथें में चूड़ियाँ, अरे ये आज लाल लिपिस्टिक भी तो है। आप तो नेचुरल कलर ही लगाती थीं?

वंदना की आँखों में सहज प्रश्न का भाव था। उसने फिर कहा- ‘यह सब देखकर सबको तो लगेगा ही ना कि.......वह पूरा वाक्य नहीं बोल सकी।

आशा ने फिर थोड़ी खीझ के साथ कहा -सुजाता अब ज्यादा बनने की कोशिश मत कर। शादी नहीं की तो....क्या मन ही मन किसी को अपना मान ली?

सुजाता चिढ़ कर बोली-‘ कहा न ऐसी कोई बात नहीं। ऐसी कोई बात होती तो क्या तुम सब जानती नहीं? मैं फिर कहती हूँ ‘उनका स्थान किसी को नहीं दे सकती। वे मेरे दिलोदिमाग में छाए हैं। लगता है साथ हैं मेरे।’

वंदना ने आश्चर्य से कहा दीदी! कुछ समझ में बात नहीं आ रही। यह लाल बिंदी ये चूड़ियाँ, ये लिपिस्टिक... अचानक इस बदलाव के पीछे राज क्या है?

सुजाता ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा- चल उधर बताती हूँ। कहते हुए सब को ऑफिस के एक कोने में लेगई और शांत मन से कहने लगी ‘‘जानती हो मैं ऑफिस आते जाते, लौटते हुए जब भी बस पड़ाव पर खड़ी होती, शॉपिंग करने जाती या सब्जी लेने जाती थी, कहीं भी रहती एक अजीब तरह से लोग मुझे घूरते रहते थे। फिर शरारती लहजे में बोली- शायद उन्हें लगता हो कि कोई वैकेंसी है। उनकी आँखों में जैसे एक सांकेतिक अश्लील आमंत्रण का भाव रहा करता है। सल डेढ़ साल से परेशान हो गयी। लगता था किसी की आँखें हमारा पीछा कर रही हों।

कोई रास्ता नहीं मिल रहा था पीछा छुराने का। बहुत सोची, क्या करूँ? क्या ना करूँ?

बस मैंने यह कवच धारण कर लिया। क्या करती? अब जिसे जो सोचना हो सोचे। पर मेरे लिए ये चूरी, या बिंदी नहीं हैं?। ये मेरे रक्षक हैं।